नर्मदा तट पर उगा ‘हरा सोना,जबलपुर के किसान अनिल पचौरी ने नारियल खेती से रचा नया इतिहास।

 नर्मदा तट पर उगा ‘हरा सोना,जबलपुर के किसान अनिल पचौरी ने नारियल खेती से रचा नया इतिहास।

समुद्री तटों तक सीमित मानी जाने वाली नारियल खेती को नर्मदा किनारे किया सफल,10 एकड़ में 2 हजार पेड़ों से प्रतिदिन 300 से 400 नारियल का उत्पादन,लाखों रुपये की आय बन रही किसानों के लिए प्रेरणा।

जबलपुर,ग्रामीण खबर MP।

आमतौर पर नारियल की खेती का नाम आते ही लोगों के मन में केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे समुद्री तटीय राज्यों की तस्वीर उभरती है। यह धारणा लंबे समय से बनी हुई है कि नारियल का पौधा केवल समुद्र के किनारे वाले क्षेत्रों की जलवायु में ही फल-फूल सकता है। लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के प्रगतिशील किसान अनिल पचौरी ने अपनी मेहनत, दूरदृष्टि और वैज्ञानिक सोच के दम पर इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।

नर्मदा नदी के किनारे स्थित लम्हेटाघाट क्षेत्र में अनिल पचौरी ने वह कर दिखाया, जिसे कभी असंभव माना जाता था। आज उनकी 10 एकड़ भूमि में लगे लगभग 2 हजार नारियल के पेड़ न केवल सफलतापूर्वक फल दे रहे हैं, बल्कि प्रतिदिन 300 से 400 नारियल का उत्पादन भी कर रहे हैं। यह उत्पादन स्थानीय बाजार की मांग को पूरा करने के साथ-साथ प्रदेश के किसानों के लिए प्रेरणा का उदाहरण बन चुका है।

अनिल पचौरी की सफलता के पीछे वर्षों की मेहनत, अध्ययन और प्रयोग छिपे हैं। उन्होंने कभी यह नहीं माना कि खेती केवल परंपरागत फसलों तक सीमित रहनी चाहिए। उनका मानना था कि यदि किसी फसल की आवश्यकताओं को समझ लिया जाए और वैज्ञानिक पद्धति से उसकी खेती की जाए, तो उसे किसी भी उपयुक्त क्षेत्र में सफल बनाया जा सकता है।

इसी सोच ने उन्हें नारियल खेती की ओर आकर्षित किया। आंध्र प्रदेश की यात्राओं के दौरान उन्होंने देखा कि वहां के किसान नारियल और मसाला फसलों की खेती के माध्यम से बेहतर आर्थिक स्थिति प्राप्त कर रहे हैं। किसानों की समृद्धि ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि यदि दक्षिण भारत में यह खेती किसानों की जिंदगी बदल सकती है तो मध्यप्रदेश में क्यों नहीं।

इस विचार को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने व्यापक अध्ययन शुरू किया। जहां कहीं भी नारियल के पेड़ दिखाई देते, वहां रुककर लोगों से जानकारी लेते। पौधों की वृद्धि, मिट्टी की प्रकृति, जलवायु और उत्पादन संबंधी हर पहलू को समझने का प्रयास करते। धीरे-धीरे उन्हें यह विश्वास हो गया कि जबलपुर की जलवायु और नर्मदा तट का वातावरण नारियल खेती के लिए अनुकूल बनाया जा सकता है।

केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहते हुए उन्होंने व्यवहारिक अनुभव प्राप्त करने का निर्णय लिया। इसके लिए वे केरल पहुंचे और लगभग दो माह तक वहां किसानों के बीच रहकर खेती की बारीकियां सीखीं। उन्होंने खेतों में काम करते हुए नारियल की पौध तैयार करने, सिंचाई प्रबंधन, पोषण व्यवस्था, रोग नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने की तकनीकों को नजदीक से समझा।

केरल से लौटने के बाद उन्होंने अपनी योजना को जमीन पर उतारने की तैयारी शुरू कर दी। अध्ययन के दौरान उन्हें पता चला कि नारियल के पौधों को पर्याप्त नमी और भूजल की उपलब्धता की आवश्यकता होती है। इसी कारण उन्होंने नर्मदा नदी के समीप लम्हेटाघाट क्षेत्र को चुना, जहां जल उपलब्धता बेहतर थी।

वर्ष 2017 में उन्होंने 10 एकड़ भूमि पर लगभग 2 हजार लॉग वैरायटी के नारियल पौधों का रोपण किया। शुरुआत आसान नहीं थी। अनेक लोगों ने इस प्रयोग को जोखिम भरा बताया। कई लोगों का मानना था कि मध्यप्रदेश में नारियल की खेती सफल नहीं हो सकती। लेकिन अनिल पचौरी ने आलोचनाओं की परवाह किए बिना अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा।

उन्होंने पौधों की नियमित देखभाल की, जैविक खाद का उपयोग किया और वैज्ञानिक सिंचाई व्यवस्था अपनाई। वर्षों तक लगातार मेहनत करने के बाद अब उनके पौधे पूर्ण विकसित होकर भरपूर उत्पादन देने लगे हैं। सात वर्षों की प्रतीक्षा के बाद आज उनके खेत में नारियल के गुच्छों से लदे पेड़ सफलता की कहानी बयां कर रहे हैं।

वर्तमान में उनके खेत से प्रतिदिन 300 से 400 नारियल बाजार में पहुंच रहे हैं। स्थानीय स्तर पर ताजे नारियल की मांग लगातार बढ़ रही है और उपभोक्ताओं को अब दूरदराज के राज्यों से आने वाले नारियल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता। इससे स्थानीय बाजार को भी मजबूती मिली है।

आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रयोग अत्यंत लाभकारी साबित हुआ है। अनिल पचौरी के अनुसार नारियल बिक्री से उन्हें प्रतिदिन लगभग 15 से 20 हजार रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है। पूरे सीजन के दौरान यह आय 30 से 40 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि किसान नई फसलों को अपनाने का साहस करें तो पारंपरिक खेती की तुलना में कहीं अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है।

विशेष बात यह है कि उन्होंने अपनी कृषि भूमि का बहुआयामी उपयोग भी किया है। नारियल के पेड़ों के बीच खाली स्थान का उपयोग करते हुए अदरक की खेती की जा रही है। इसके साथ ही आम्रपाली और मल्लिका प्रजाति के आमों का भी रोपण किया गया है। यह मिश्रित खेती मॉडल न केवल अतिरिक्त आय का स्रोत बन रहा है, बल्कि आम के पेड़ नारियल पौधों को तेज हवाओं और आंधी-तूफान से भी सुरक्षा प्रदान करते हैं।

मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और पौधों की बेहतर वृद्धि के लिए वे समय-समय पर जैविक खाद का उपयोग करते हैं। इसके लिए कठौंदा प्लांट से उपलब्ध कंपोस्ट खाद का लाभ लिया जाता है। यह खाद पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराती है और भूमि की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाए रखती है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अनिल पचौरी का यह मॉडल प्रदेश के उन किसानों के लिए नई दिशा प्रदान कर सकता है, जो परंपरागत खेती से सीमित आय प्राप्त कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और खेती की बढ़ती चुनौतियों के बीच फसल विविधीकरण किसानों की आर्थिक सुरक्षा का मजबूत माध्यम बन सकता है।

अनिल पचौरी की कहानी केवल एक किसान की सफलता नहीं, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक है जो सीमाओं को चुनौती देती है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि खेती में सफलता केवल भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि सही जानकारी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, धैर्य और निरंतर प्रयास से असंभव लगने वाले सपनों को भी साकार किया जा सकता है। आज नर्मदा के तट पर लहलहाते नारियल के बागान उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और नवाचार की जीवंत मिसाल बन चुके हैं।



Post a Comment

Previous Post Next Post