दशलक्षण महापर्व के छठे दिन खितौला स्थित श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में श्रद्धा और आस्था के बीच मनाया गया उत्तम संयम धर्म का पर्व,प्रवचन और भक्ति कार्यक्रमों से गूंजा मंदिर परिसर।

 दशलक्षण महापर्व के छठे दिन खितौला स्थित श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में श्रद्धा और आस्था के बीच मनाया गया उत्तम संयम धर्म का पर्व,प्रवचन और भक्ति कार्यक्रमों से गूंजा मंदिर परिसर।

संयम ही आत्मा का सच्चा आभूषण,इच्छाओं पर नियंत्रण से मिलता है संतोष और आत्मिक शांति।

सिहोरा,ग्रामीण खबर MP:

श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर, खितौला में दशलक्षण महापर्व का छठा दिन रविवार को श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के वातावरण में मनाया गया। दशलक्षण महापर्व को आत्मशुद्धि और आत्मसंयम का पर्व माना जाता है, जिसमें प्रतिदिन एक विशेष धर्म पर मनन-चिंतन होता है। इसी क्रम में रविवार को छठे दिन उत्तम संयम धर्म का पर्व बड़े ही धार्मिक उत्साह के साथ मनाया गया।

सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहा और पूरा वातावरण भक्ति, आस्था और धर्ममय बना रहा। प्रातःकालीन मंगलाभिषेक, शांतिधारा और विधान के पश्चात प्रवचनमाला का आयोजन हुआ। इस अवसर पर जबलपुर से विशेष रूप से पधारे भैया जी राजेश गढ़ावाले ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संयम ही आत्मा का वास्तविक आभूषण है। संयम ऐसा साधन है जो व्यक्ति को पाप से दूर रखकर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।

उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि संयम केवल बाहरी आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विचार, वाणी और व्यवहार तीनों स्तरों पर आवश्यक है। एक संयमित जीवन ही मनुष्य को स्थिरता, संतुलन और शांति प्रदान कर सकता है। वर्तमान समय की भागदौड़ भरी और भोगवादी प्रवृत्ति में संयम का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। यदि व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर संयम रख सके तो वह आत्मिक संतोष और सच्ची शांति प्राप्त कर सकता है। संयम धर्म केवल तपस्या या त्याग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक उत्तम जीवन पद्धति है जिसमें आत्मा की शुद्धि और मोक्ष का मार्ग निहित है।

दिनभर मंदिर परिसर में धार्मिक गतिविधियों का क्रम चलता रहा। भक्ति गीतों और स्तुतियों से मंदिर का वातावरण गूंजायमान रहा। समाज की महिलाओं, युवक-युवतियों और बच्चों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और संयम धर्म के पालन का संकल्प लिया। बच्चों के लिए विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया, जिनमें संयम धर्म की महत्ता को आकर्षक और रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया।

कार्यक्रम के दौरान समाज के वरिष्ठजनों ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि दशलक्षण महापर्व केवल पूजा-पाठ या आयोजन मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और आत्मावलोकन का पर्व है। प्रत्येक दिन मनाए जाने वाले दस धर्म मानव जीवन को सही दिशा देने का कार्य करते हैं। छठे दिन का पर्व हमें यह सीख देता है कि संयम ही वह शक्ति है जो जीवन के उतार-चढ़ाव में संतुलन बनाए रखने में सहायक है। संयम का पालन करने वाला व्यक्ति जीवन में सच्चे सुख और आत्मिक संतोष को प्राप्त करता है।

उल्लेखनीय है कि दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत प्रतिदिन एक धर्म का पर्व मनाया जाता है। पहले दिन उत्तम क्षमा, दूसरे दिन उत्तम मार्दव, तीसरे दिन उत्तम आर्जव, चौथे दिन उत्तम शौच, पांचवें दिन उत्तम सत्य और रविवार को छठे दिन उत्तम संयम धर्म का पर्व मनाया गया। कल सातवें दिन उत्तम तप धर्म का पर्व मनाया जाएगा, जिसके लिए मंदिर समिति द्वारा विशेष तैयारियाँ की गई हैं। समिति ने समाजजनों से अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर इस महापर्व को सफल बनाने का आह्वान किया है।

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