721 वर्षों बाद धार भोजशाला में विशेष शुक्रवार:वाग्देवी के जयकारों,वैदिक मंत्रोच्चार और महाआरती से गूंजा ऐतिहासिक परिसर।
हाई कोर्ट के आदेशों के बाद बदली धार्मिक व्यवस्था,भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति;भोजशाला विवाद ने फिर देशभर में पकड़ी चर्चा।
धार,ग्रामीण खबर MP।
मध्यप्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में शुक्रवार का दिन धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक महत्व और प्रशासनिक सतर्कता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया। वर्षों से विवाद और न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में रहे इस परिसर में शुक्रवार को मां वाग्देवी की विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चार, अखंड पाठ और भव्य महाआरती का आयोजन किया गया। पूरे परिसर में “जय मां वाग्देवी” और “हर-हर महादेव” के जयकारे लगातार गूंजते रहे। सुबह से ही श्रद्धालुओं का भोजशाला पहुंचना प्रारंभ हो गया था और शाम तक परिसर पूरी तरह धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के वातावरण में डूबा दिखाई दिया।
भोजशाला लंबे समय से देश के सबसे चर्चित धार्मिक और ऐतिहासिक विवादों में शामिल रही है। हिंदू पक्ष इस स्थल को मां सरस्वती अर्थात वाग्देवी का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। इसी कारण वर्षों से यहां पूजा और नमाज की व्यवस्था को लेकर विवाद बना हुआ था। पूर्व में प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाती थी, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय द्वारा जुमे की नमाज अदा की जाती थी। हालिया न्यायिक आदेशों और प्रशासनिक बदलावों के बाद शुक्रवार को हिंदू पक्ष द्वारा अखंड पूजा और महाआरती आयोजित किए जाने को लेकर पूरे देश में चर्चा तेज हो गई।
शुक्रवार सुबह ब्रह्ममुहूर्त से ही भोजशाला परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत हो गई थी। वैदिक ब्राह्मणों द्वारा मंत्रोच्चार के बीच विशेष पूजा संपन्न कराई गई। श्रद्धालुओं ने मां वाग्देवी के दर्शन कर सुख-समृद्धि और प्रदेश की शांति के लिए प्रार्थना की। महिलाओं, युवाओं, साधु-संतों और विभिन्न धार्मिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या परिसर में मौजूद रही। कई श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में हाथों में भगवा ध्वज और धार्मिक प्रतीक लेकर पहुंचे थे। पूरे क्षेत्र में धार्मिक भजनों और शंखध्वनि का माहौल बना रहा।
शाम के समय आयोजित महाआरती भोजशाला के इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक बन गई। दीपों की रोशनी, घंटों की ध्वनि और वैदिक मंत्रों के बीच जब महाआरती प्रारंभ हुई तो पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से भर उठा। श्रद्धालुओं ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए भावुक प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने कहा कि वर्षों बाद शुक्रवार को इस प्रकार खुले रूप से पूजा और आरती का आयोजन होना आस्था से जुड़ा बड़ा अवसर है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। भोजशाला परिसर और आसपास के क्षेत्रों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। शहर के प्रमुख चौराहों, संवेदनशील इलाकों और भोजशाला मार्ग पर अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की गई। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधीक्षक और अन्य विभागों के अधिकारी लगातार निगरानी बनाए रहे। ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी के माध्यम से पूरे क्षेत्र की गतिविधियों पर नजर रखी गई। सोशल मीडिया पर भी विशेष निगरानी रखी गई ताकि किसी प्रकार की अफवाह या भड़काऊ सामग्री से माहौल प्रभावित न हो।
भोजशाला को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज होती दिखाई दी। कई हिंदू संगठनों और धार्मिक नेताओं ने इसे “ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण” बताया। वहीं मुस्लिम पक्ष द्वारा इस पूरे मामले को न्यायालय में चुनौती दिए जाने की चर्चाएं भी सामने आईं। जानकारों का कहना है कि भोजशाला विवाद आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक विमर्श का प्रमुख विषय बना रह सकता है।
इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का संबंध परमार वंश के महान शासक राजा भोज से माना जाता है। यह स्थल भारतीय संस्कृति, शिक्षा, साहित्य और स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि यहां प्राचीन काल में विद्या और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। इसी कारण भोजशाला को लेकर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी जुड़ा हुआ है। पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के बीच भी इस स्थल को लेकर लंबे समय से शोध और बहस जारी है।
शुक्रवार को हुए आयोजन के बाद प्रदेशभर में भोजशाला को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सोशल मीडिया पर भी इस आयोजन की तस्वीरें और वीडियो व्यापक रूप से साझा किए गए। कई लोगों ने इसे सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण क्षण बताया, जबकि कुछ वर्गों ने मामले को संवेदनशील बताते हुए शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की।
प्रशासन ने आयोजन के बाद पूरे घटनाक्रम को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित बताया है। अधिकारियों के अनुसार पूरे दिन कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली और श्रद्धालुओं ने भी अनुशासन बनाए रखा। हालांकि प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि भोजशाला से जुड़े सभी मामलों में न्यायालय के निर्देशों का पूर्ण पालन किया जाएगा और भविष्य की व्यवस्थाएं भी कानूनी प्रक्रिया के अनुसार तय होंगी।
भोजशाला का यह विशेष शुक्रवार अब केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे इतिहास, आस्था, राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में न्यायालय के आगामी निर्णय, प्रशासनिक दिशा-निर्देश और विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं इस विषय को और अधिक चर्चा में बनाए रख सकती हैं।

