तपती धूप में तड़पता बचपन,स्ट्रेचर पर बेटे को धकेलते रहे माता-पिता,वायरल वीडियो के बाद हरकत में आया प्रशासन।
इंदौर के एमवाय अस्पताल की व्यवस्था पर उठे सवाल,जांच के बाद डॉक्टर,नर्सिंग स्टाफ और सुरक्षा प्रभारी पर हुई कार्रवाई।
इंदौर,ग्रामीण खबर MP।
मध्य प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शुमार महाराजा यशवंतराव अस्पताल (एमवायएच) एक बार फिर अपनी व्यवस्थाओं को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है। भीषण गर्मी के बीच एक गंभीर रूप से बीमार 11 वर्षीय बालक को इलाज के लिए एमवाय अस्पताल से सुपर स्पेशलिटी अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन परिजनों को न तो एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई और न ही पर्याप्त सहायता मिली। मजबूर माता-पिता को अपने बेटे को स्ट्रेचर पर लिटाकर स्वयं अस्पताल परिसर से दूसरे अस्पताल तक ले जाना पड़ा। इस दौरान बच्चे की मां उसे गर्मी से बचाने के लिए बार-बार पानी में दुपट्टा भिगोकर उसके शरीर पर रखती रही।
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया। वीडियो में दिखाई दे रहे दृश्य ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। लोगों ने सोशल मीडिया पर इस घटना को मानवता और स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता का उदाहरण बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
जानकारी के अनुसार बालक रीढ़ की हड्डी और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी गंभीर बीमारी से पीड़ित था। चिकित्सकों ने उसे बेहतर उपचार के लिए सुपर स्पेशलिटी अस्पताल भेजने का निर्णय लिया। परिजनों का आरोप है कि रेफरल के बाद उन्हें किसी प्रकार की परिवहन सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। अस्पताल परिसर में मौजूद कर्मचारियों से सहायता मांगने के बावजूद उन्हें कोई संतोषजनक सहयोग नहीं मिला, जिसके बाद वे स्वयं स्ट्रेचर को धक्का देकर बच्चे को लेकर निकल पड़े।
घटना के समय तेज गर्मी और चिलचिलाती धूप ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया। वायरल वीडियो में बच्चे की मां की व्याकुलता और परिवार की बेबसी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। यह दृश्य देखकर आमजन के साथ-साथ सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने भी अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
मामले ने तूल पकड़ने के बाद भोपाल से लेकर इंदौर तक स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों में हलचल मच गई। एमजीएम मेडिकल कॉलेज और अस्पताल प्रशासन ने तत्काल जांच के आदेश दिए। प्रारंभिक जांच में व्यवस्थागत लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई।
जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित चिकित्सक के सात दिनों के वेतन की कटौती करने का निर्णय लिया गया। वहीं तीन नर्सिंग अधिकारियों का एक दिन का वेतन रोका गया। सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक मानते हुए सुरक्षा प्रभारी के विरुद्ध निलंबन संबंधी कार्रवाई की गई। इसके अतिरिक्त संबंधित एजेंसियों और कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के निर्देश दिए गए।
अस्पताल प्रशासन ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना उनकी प्राथमिकता है और इस मामले में जो भी कर्मचारी दोषी पाए गए हैं, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। प्रशासन ने यह भी आश्वासन दिया है कि मरीजों के रेफरल और परिवहन की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा ताकि भविष्य में किसी भी मरीज या उसके परिजनों को ऐसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
हालांकि यह घटना केवल एक प्रशासनिक चूक भर नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के उस संवेदनशील पक्ष को भी उजागर करती है जहां संसाधनों और व्यवस्थाओं की कमी का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में यदि गंभीर रूप से बीमार बच्चे को इस प्रकार स्ट्रेचर पर धूप में ले जाना पड़े, तो यह व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर संकेत करता है।
फिलहाल प्रशासनिक कार्रवाई के बाद मामला शांत होता दिखाई दे रहा है, लेकिन यह घटना लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही और मानवीय संवेदनाओं पर बहस का विषय बनी रहेगी। आमजन की अपेक्षा है कि इस मामले से सबक लेते हुए अस्पताल प्रबंधन भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाएगा, ताकि किसी भी मरीज और उसके परिवार को इस तरह की पीड़ा और बेबसी का सामना न करना पड़े।

