शहीद बेटे की याद में छलके मां के आंसू,राष्ट्रपति ने बढ़कर थमाया कीर्ति चक्र।
लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी को मरणोपरांत मिला देश का दूसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता सम्मान,राष्ट्रपति भवन में भावुक कर देने वाला दृश्य।
कटनी,ग्रामीण खबर MP।
राष्ट्रपति भवन में आयोजित रक्षा अलंकरण समारोह उस समय भावनाओं से भर उठा, जब देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। समारोह में अपने वीर बेटे की याद में भावुक हुई मां के आंसू देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। यह क्षण केवल एक सम्मान समारोह का नहीं, बल्कि एक मां के असीम त्याग, एक सैनिक के अदम्य साहस और पूरे राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक बन गया।
राष्ट्रपति भवन के भव्य दरबार हॉल में आयोजित समारोह में देशभर के वीर सैनिकों और उनके परिजनों को सम्मानित किया गया। इसी क्रम में जब शहीद लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी के नाम की घोषणा हुई और उनकी मां सम्मान ग्रहण करने के लिए आगे बढ़ीं, तो बेटे की स्मृतियां उनके मन में उमड़ पड़ीं। अपने लाल को याद कर वह भावुक हो गईं और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
इस मार्मिक दृश्य ने समारोह में उपस्थित सभी लोगों को भावुक कर दिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी इस पीड़ा और गौरव से भरे क्षण को महसूस किया। उन्होंने आगे बढ़कर शहीद की मां को सांत्वना दी और उन्हें मरणोपरांत प्रदान किया गया कीर्ति चक्र सम्मान सौंपा। राष्ट्रपति के इस आत्मीय व्यवहार ने पूरे समारोह को और अधिक भावनात्मक बना दिया।
लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी भारतीय सेना के उन जांबाज अधिकारियों में शामिल थे, जिन्होंने कर्तव्य पालन के दौरान अपने प्राणों की आहुति देकर सैनिक धर्म का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया। वर्ष 2025 में सिक्किम क्षेत्र में एक सैन्य अभियान के दौरान उनके एक साथी सैनिक का पैर फिसलने से वह तेज बहाव वाली पहाड़ी धारा में बहने लगा। संकट की उस घड़ी में लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी ने अपनी जान की परवाह किए बिना साथी सैनिक को बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी।
उन्होंने असाधारण साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए अपने साथी की जान बचा ली, लेकिन स्वयं तेज बहाव की चपेट में आ गए। देश और अपने साथी के लिए दिया गया उनका यह सर्वोच्च बलिदान भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास में सदैव याद रखा जाएगा।
उनकी वीरता, नेतृत्व क्षमता और अदम्य साहस को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र प्रदान करने का निर्णय लिया। कीर्ति चक्र देश का दूसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है, जो असाधारण बहादुरी और वीरता के लिए दिया जाता है।
समारोह के दौरान जब शहीद अधिकारी की मां ने सम्मान ग्रहण किया, तो पूरा राष्ट्रपति भवन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उपस्थित गणमान्य अतिथियों, सैन्य अधिकारियों और परिजनों ने खड़े होकर इस वीर सपूत को श्रद्धांजलि अर्पित की। यह क्षण हर भारतीय के लिए गर्व और भावुकता का संगम बन गया।
लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी की शहादत देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि मातृभूमि की रक्षा और साथी सैनिकों की सुरक्षा के लिए भारतीय सैनिक किसी भी बलिदान से पीछे नहीं हटते। राष्ट्र उनके साहस, समर्पण और बलिदान को सदैव नमन करता रहेगा।
राष्ट्रपति भवन में घटित यह भावुक दृश्य आने वाले वर्षों तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगा। एक ओर मां की आंखों में बेटे को खोने का दर्द था, तो दूसरी ओर पूरे देश के सम्मान और गर्व का एहसास। यही वह क्षण था जिसने एक बार फिर साबित कर दिया कि शहीद कभी मरते नहीं, वे राष्ट्र के हृदय में अमर हो जाते हैं।

